Ajay

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जुस्तजू भाग --- 26 (बोनस पार्ट)

बात दिल की

    साथियों आप सभी का दिल से शुक्रिया। कभी सोचा नहीं था कि इस कहानी के इतने भाग हो जायेंगे। पहले कभी भी इतने भाग लिखे नहीं। हमेशा अधिकतम 2-3 हजार शब्दों में बात पूरी करने की आदत रही। तो सो सॉरी कि संवादों की कमी खली होगी आपको। पर सच में बुरा लग रहा है कि इसने अंत में आप सभी की रुचि खो दी। अतः उन सभी साथियों, जिन्होने अपना कीमती समय इस कहानी के अंत तक दिया, का दिल से हार्दिक आभार और धन्यवाद। तो आज इस कहानी को अपने अंत तक ले जाने वाले अंक को आप तक पहुंचाना चाहता हूं। आशा है कि यह शायद आपको पसंद आए। हां अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजियेगा, खासकर अपनी पसंद जरूर बताइएगा।




अब बंद कीजिए रोना पुरानी बातों पर।
आइए अपने हाथों तक़दीर बदलते हैं।।
बेशक कइयों ने छीनी खुशी हमसे।
पर जिन्होंने साथ दिया, उन्हें खुशी देते हैं।।


    आरूषि को अपने इस परिवार से इतना प्यार मिला था कि वह अपने दर्द भरे वक्त को भुला चुकी थी। अब वह अपने हॉस्पिटल और परिवार को सारा वक्त देती थी। उसकी प्रसिद्धि ब्रेन वाउंड सर्जन के रूप में फेमस हो चुकी थी। कई मेडिकल कॉलेजेज में उसे प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में बुलाया जाने लगा। उधर अनुपम भी केंद्रीय गृह मंत्रालय में अपने काम में व्यस्त था। काम की लगन दोनों में समान थी इसलिए दोनों ही अपने वर्क फील्ड्स में चहेते थे सभी के। आरूषि ने अपनी देवरानी स्मिता को अपने पास ही बुला लिया था। उसने एमबीए कर रखा था तो वह मम्मीजी के बिज़नेस और हॉस्पिटल के मेनेजमेंट को अच्छी तरह संभाल लेती थी। उसके लगभग हमउम्र थी तो उसकी बेस्टी भी बन गई। कारोबार और संपत्तियां मैनेज करने के लिए परिवार में सदस्य कम थे तो आरुषि के नए रिश्ते परिवार की तरह मदद करते थे। स्मिता के बच्चे नहीं थे तो अर्पण के साथ उसका सारा समय बीत रहा था वहीं आरव तो अपनी बड़ी परदादी और दोनों दादियों का बेहद लाड़ला था और उदयपुर ले जाया गया था।
आरूषि को हारवर्ड यूनिवर्सिटी और नाटो से पोस्ट डॉक्टोरल कोर्स के लिए स्कॉलरशिप पर अमेरिका जाने का बुलावा आया। इसमें सबसे बड़ा हाथ उससे सीनियर सर्जन्स और अमेरिकन कॉन्सुलेट के डिप्टी एंबेसेडर का था। उनके बच्चे की एक्सीडेंट में घायल होने पर आरूषि ने ही जान बचाई थी। आरूषि इस स्कॉलरशिप पर जाना नहीं चाहती थी। पर स्मिता अड़ गई।

"आरू दी, यह तो गलत है न"

"स्मिता, बहुत पढ़ ली। अपने परिवार को महसूस करना और उसे समय देना चाहती हूं अब।"

"फिर मैं आपका परिवार नहीं हूं न !!"

"बेशक हो।"

"दी आपको ईश्वर से वरदान मिला है, इतनी गंभीर सर्जरी सफलता से करने का। पर अभी भी एक कमी है। आपको ट्यूमर्स और अलसर्स की सर्जरी का अनुभव नहीं और इसी में आपको कमांड हासिल करनी है।"

"पर नाटो, वहां तो आर्मी सर्जन्स होते हैं।"

"तो उन्होंने आपकी विशेषज्ञता के कारण ही आपको अवसर दिया है। अभी तक इंडिया में ऐसा किसी को नहीं मिला।"

"पर अर्पण बहुत छोटा है।"

"दी, अर्पण मेरा बेटा नहीं है न, इसलिए आपको उसकी चिंता है न !!!"

"स्मिता, मैंने कभी अपने बड़े होने का कोई हक नहीं जताया। पर लगता है कि आज आप यह काम भी मुझसे करवा लेंगी।"आरूषि गुस्सा हो उठी थी। वह अच्छी तरह जानती थी कि अर्पण स्मिता की जान ही था।

"सॉरी दी, शायद ज्यादा बोल गई न !!" स्मिता की आंखे भर आई थी। वह उठकर जाने लगी।

"बैठ जाओ, बोलो जो आप चाहोगी वही करूंगी पर परिवार से ऊपर कुछ नहीं करूंगी।"

      स्मिता बैठी नहीं पर बाहर जाने के लिए बढ़े कदम भी रोक लिए। आरूषि जानती थी कि स्मिता उसे अपनी बहिन की तरह प्यार करती थी। वह भी एकलौती संतान थी तो आरुषि के बगैर उसका एक पल भी नहीं गुजरता था। अपने पति को भी वह ही मुंबई ले आई थी परिवार से सहमति लेकर। दोनों ही उसे अपनी बड़ी बहिन सा आदर और प्यार देते थे तो उसे अपने भाई या बहिन की कमी महसूस ही नहीं हुई। आज उसका अवसर था।

"चलो ठीक है अगर सारे परिवार की सहमति होगी तो सोचूंगी।"

"सच दी !!!!"स्मिता लिपट गई उससे।

    परिवार की अनुमति भी मिल गई थी। अनुपम को जरूर कुछ खला पर स्मिता, अपने परिवार और मरीजों को मिलने वाली सुविधा का सोचकर उसने भी हां कर दी। आखिर आरूषि के जाने का दिन आ ही गया। अनुपम को छोड़कर सारा परिवार मुम्बई एअरपोर्ट पर मौजूद था।

   न्यूयॉर्क में आते ही हारवर्ड यूनिवर्सिटी में वह व्यस्त हो गई। काम के प्रति अपने समर्पण और बुद्धिमत्ता ने वहां के प्रोफेसर्स और आर्मी सर्जन्स का चहेता बना दिया। एक वर्ष में ही उसके रिजल्ट बेहद प्रभावी थे। अब उसे अमेरिका और नाटो सहयोगी देशों में अवसर मिलना था। उसे फिनलैंड भेजा गया। वहां उसे 10 दिन का ब्रेक मिला था। उधर अनुपम को फिनलैंड में यूनाइटेड नेशंस की तरफ़ से भारत सरकार ने प्रतिनियुक्ति पर 2 साल के लिए भेज रखा था तो आरूषि उससे मिलने और साथ रहने का अवसर पाकर नौंवे आसमान पर थी। और वह 10 दिन केवल उसके साथ ही रहने को ठान चुकी थी। उनकी शादी के 11 वर्ष हो चुके थे पर अभी भी वह 30- 31 की ही लगती थी और अवसर मिलने पर वैसी ही उत्साह और उमंग से भरी हो जाती थी।

************

    हेलसिंकी एअरपोर्ट पर अनुपम आरुषि की फ्लाईट लैंड होने का इन्तजार कर रहा था। उसकी निगाहें अब फ्लाईट से उतर रही विमेन में से किसी इंडियन अटायर वाली वूमन को ढूंढ रही थी पर वहां कोई नहीं थी।
     वह निराश हो चला था कि उसके कंधे पर पीछे से किसी ने हाथ रखा, "हैलो हैंडसम, आर यू वेटिंग समवन स्पेशल ?"
वह चौंककर पीछे घूमा। आरूषि यूएस मेडीकल यूनिट मैरीलैंड की इनसिग्निया वाली वर्दी में थी। सीने पर लेफ्टिनेंट सर्जन डॉक्टर आरूषि का बैज लगा था। बेहद फिट, खूबसूरत और उम्र में लगभग 30 की लगती !! उसे अभी देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह विवाहित और 2 बच्चों की मां भी है। अनुपम हैरान सा उसे निहारे जा रहा था। आरूषि ने फिर से उसका कंधा थपथपाया।
   आरूषि के पीछे उसके प्रभारी कर्नल जेम्स एटकिंसन थे, "हैलो जेंटलमैन, नाइस टू मीट यू।"

अनुपम ने तुरंत उनसे हाथ मिलाया,"इट्स ग्रेट टू सी यू सर। इट्स माय प्लेजर।"

वे आरूषि की ओर घूमे, "एंजॉय योर हसबैंड कंपनी, सी यू आफ्टर वेकेशंस।"

"श्योर सर", आरूषि ने सैल्यूट कर विदा ली।

"लो, करेला और नीम चढ़ा !! देवीजी राजकुमारी और परी बनकर ही नहीं थमी अब तो फ़ौजी भी हो गई। अब हुक्म बजा लाने की आदत डाल ले अनुपम। पता नहीं कौन कौनसे रंग और देखने है इसके ??"

"क्या सोच रहे हो ? कहीं अपने आप को कुंवारे तो नहीं समझ रहे हो ?" आरूषि स्त्री सुलभ जलन से भर गई। आख़िर 1 साल कम तो नहीं था। फिर अनुपम !! वह तो ज़रा भी नहीं बदला था।

"यस मैडम, आपके लिए यह अर्दली हाजिर है, हुक्म करें।"

"पहले घर चलिए, फिर बताती हूं।"आरूषि के स्वर में धमकी थी।

"वेट, वेट। इसकी सेवाएं एक्सक्लूसिवली आपके लिए ही हैं।"

      आरूषि मन में मुस्कुरा उठी पर अनुपम पर जाहिर नहीं होने दिया।
         घर पहुंचते ही आरूषि वेस्टर्न पहनावे में आ गई। अनुपम के लिए आरूषि का यह रूप चौंका देने वाला था और आरूषि की बोल्डनेस !!! वह सिर्फ मुंह फाड़े बस देखे सुने जा रहा था।

"तो डियर हसबैंड,10 दिन.....,10 दिन हैं आपके पास !! तो भूल जाइए सब और हमारा साथ एंजॉय कीजिए।"

"जी मदाम, सारा शेड्यूल बता दीजिए ताकि मैं टाइम पर फॉलो करता रहूं।"

"तो जाइए। फिनलैंड के टूर की व्यवस्था तुरंत हो !!"

"श्योर मदाम।"उसने आर्मी सैल्यूट दिया।

आरूषि हंस पड़ी और आगे बढ़कर फ्रेंच किस दे दिया।

"अरे बाप रे !! यह क्या था !!! हे देवी !!! कृपया भारतीय अवतार धारण करें। बच्चे की जान लेंगी क्या ??"

"10 दिनों तक केवल आपकी लव इंटरेस्ट ही है यहां !!! भूल जाइए कि आप शादीशुदा हैं। केवल आप और हम !! और खबरदार कोई काम का बहाना नहीं।"

"उफ्फ आप पागल करके छोड़ेंगी।"

"सिर्फ अपने प्यार में।" वह फिर से अनुपम से लिपट गई थी। 


   आख़िर उसने अपनी मैरिड लाइफ़ एंजॉय की ही कहां थी। अपने बेवजह के डर और वक्त की पैदा की गई दूरियां !!! फिर परिजनों और सामाजिक बंधन !! बच्चे हुए थे पर मातृत्व भी सही से अनुभव नहीं कर सकी थी।
     उधर अनुपम का भी यही हाल था। वह अपने बचपन के प्यार को भले पा चुका था पर पाने की फीलिंग्स !!! वह कभी नहीं हुई थी।

   "तो मिस्टर, आज की डिनर डेट पर आने के बारे में क्या ख्याल है ?"

    "जी....!!"

"जल्दी से तैयार हो जाइए वर्ना डील एक्सपायर हो जायेगी।"

"बिल्कुल नहीं, मैं इतना सुनहरा मौका हाथ से जाने नहीं दूंगा।" अनुपम कहकर जल्दी से ऑफिस चला गया छुट्टियों के लिए अप्लाई करने।

आते समय क्लब बोट्टा में सीट्स बुक कर ली थी उसने। घर पर पहुंचते ही आरूषि ने उसे फिर से चौंका दिया। वह आज अपने सबसे खतरनाक अवतार में थी। मिनी स्कर्ट और शर्ट जिसके मात्र एक - दो  ही बटन बंद थे। उसे अभी देखकर कौन कह सकता था कि वह एक मास्टर सर्जन है !!! 

    "जान ही ले लोगी क्या ??"

    "अभी तो शुरुआत है। बहुत परेशान किया था न शिवेंद्र की शादी में ? अब बताती हूं।"

उसने कार निकाली। आज तो वह नजरें हटा ही नहीं पा रहा था। वह मर्लिन मुनरो की कॉपी लग रही थी।

   "चलो डांस करने का मन है।"आरूषि ने उसे डांस फ्लोर पर खींच लिया। शानदार फिनिश धुन पर दोनों कुछ पल तो असहज रहे पर जब शुरू हुए तो सब फ्लोर छोड़कर उन्हें ही देखने लगे।
 धुन खत्म होते ही तालियों ने उन्हें जैसे स्वर्ग से हकीकत में ला पटका। 
        अनुपम उसे लेकर पलटने लगा कि आरूषि अपने घुटनों पर आ गई,"विल यू लव मी, ऑलवेज ?"

अनुपम ही नहीं सभी व्यूवर्स हैरान थे उसके इस मूव पर !!

    "नो, बिकोज यू आर माई लाइफ एंड एवरीवन लव्स हिज लाईफ।"

"यू नो !! यू मेड माय लाइफ। आई लव यू, लव यू, लव यू।"आरूषि के इकरार ने जैसे अनुपम के हृदय में सिर्फ प्यार ही प्यार भर दिया था।

     खाने के बाद दोनों घर लौट आए। अनुपम थोड़ी देर के लिए ज़रूरी फोन करने ड्राइंग रूम में गया। बेडरूम में लौटा तो फिर से आरूषि हैरान कर रही थी। उसका वह रुप देखकर अनुपम अपने को रोक नहीं पाया। आज रात उनके बीच सिर्फ प्यार ही प्यार था और थी एक दूसरे के लिए पाने की चाहत।

        10 दिन पंख लगाकर उड़ गए। इन 10 दिनों में सिर्फ वो दोनों ही थे। और था उनके मध्य का शाश्वत प्यार।

    इन 10 दिनों में वे रोवेनियमी, सुओलिनमा, लेक साइमा, पोर्वो, नुक्सियो, आर्कटिक पार्क आदि सारी जगहों पर घूमे। हर दिन, हर रात दोनों के लिए अलग थी। आख़िर लगा जैसे दोनों का हनीमून ही था। फिर से दोनों बिजी हो गए। 3 माह पंख लगाकर उड़ गए। आरूषि  और अनुपम को न्यू यॉर्क ही जाना था अब। अनुपम को वहां यू एन मुख्यालय में पोस्ट किया गया था। 

*******

     दोनों को साथ रहने देने की शायद ईश्वर ने भी ठान ली थी। अब आरूषि का यूएस आर्मी में ट्रेनिंग पीरियड पूरा हो गया था। सिर्फ पढ़ाई और युनिवर्सिटी हॉस्पिटल में सर्जरीज। वह मनोयोग से ट्यूमर्स और अल्सर्स को ऑपरेट कर रही थी। हां असफलता भी मिली पर वे केस केवल कुछ प्रतिशत होप वाले ही थे। वह एक्सीडेंट और गोली से घायल लोगों की सर्जरी में बेहद सफ़ल थी और कैंसर के मामले में भी।

                आज सुबह अनुपम उठा तो हैरान था। आरूषि हमेशा 4 बजे तक उठ जाती थी पर आज 5 बज रहे थे। उसने आरूषि को हिलाया, "आरू, सुबह हो गई। आज हॉस्पिटल नहीं जाना है क्या ?"

       "उम्म, आज मुझे ऑफ मिला है। सोने दो न और आप भी सो जाओ।" आरूषि उसे पकड़कर फिर से सोने लगी।

         "आरू तबियत ठीक है न ??" अनुपम चिंतित हो उठा।

         "सो जाओ न !" आरूषि चिड़चिड़े स्वर में बोली और उससे लिपट गई। अनुपम भी उसकी थकान के बारे में सोचकर फिर से सो गया।

      "उठिए आपको आज वॉशिंगटन जाना था न।"आरूषि ने उसे जगाया। उसने घड़ी देखी सुबह के साढ़े छः बज रहे थे। उसकी फ्लाइट 8 बजे की थी। आरूषि ने उसके लिए पोहा बना दिया था।

2 दिन बाद वह लौटा तो स्मिता उसके साथ ही एअरपोर्ट से घर पहुंची।

      "दी कहां हो ?? देखिए मैं किसे लाई हूं ??"

      "वेलकम स्मिता। जानती हूं।" आरूषि थके स्वर में बोली थी।

     अनुपम और स्मिता दोनों हैरान थे। ऐसे तो कभी भी आरूषि नहीं थी !! जब वह अकेली थी या जब वह लखनऊ में, उदयपुर में और मुंबई में भी !!"

    "भाई सा, भाभी की तबियत को क्या हुआ है ?"

    "मैं भी समझ नहीं पा रहा।"

     "आप कुछ कीजिए।"

      "हम्म, पर यह मानेगी क्या ? ख़ुद डॉक्टर है तो आसानी से बीमार भी नहीं मानती खुद को।"

उसने हॉस्पिटल में बात की और चुपचाप फिजिशियन से अपॉइंटमेंट ले लिया। 

       "वाइटेल्स आर नॉर्मल बट आई सजेस्ट यू कंसल्ट गायनिक।" डॉक्टर स्मिथ ने उसे केबिन में बुलाकर कहा।

     "बट डॉक, व्हाय गायनिक ?"

    "आई एम अफ्रेड बट इट्स मे बी सम प्रॉब्लम। आई रिकमेंड हर टू डॉक्टर कपूर। शी इज द बेस्ट गाइनेकोलॉजिस्ट।"

वह हैरान सा घर लौट आया। उसे अकेला देखकर स्मिता भी परेशान थी। उसे जब पता चला तो स्मिता ने अपने बहाने से आरूषि को दिखाने का सोचा। अनुपम भी तैयार हो गया। शाम को स्मिता ने खाना तैयार कर दिया। दाल चावल, ब्रोकली और सलाद था सिंपल सा जो आरूषि को हमेशा पसंद था। पर आरूषि ने खाने से इंकार कर दिया और जाकर सो गई। यह तो दोनों को अचंभित कर गया।

       सुबह स्मिता बहाने से उसे वहां ले गई। पर डॉक्टर कपूर ने अनुपम को बुलवा लिया।

       "इट इज डबल गुड न्यूज फॉर यू, अनुपम। बोथ वर प्रेगनेंट।"

   "व्हाट !!!!  बट द पेशेंट वाज आरूषि !!!"

     "यस पर दोनों पॉजिटिव है आप किसी और को घर से बुला लीजिए।"

     अनुपम हैरान और परेशान था। उसका चेहरा देखकर डॉक्टर कपूर बोली, "दोनों का आपसे क्या रिलेशन है ?"

     "जी डॉक, डॉक्टर आरूषि मेरी वाइफ है और स्मिता मेरे छोटे भाई की पत्नी।"

      "और दोनों की फर्स्ट प्रेगनेंसी है ?"

   "नहीं, सिर्फ स्मिता की। पर आरूषि के तो दो बच्चे हैं पहले से, फिर वो....???"

        "तो क्या हुआ ? उसकी उम्र अभी भी है मां बनने की। यह मूड स्विंग्स है और इनकी पिछली हिस्ट्री डिप्रेशन की है तो शायद इन्होंने पहले कभी इनको महसूस ही नहीं किया होगा। आपके घर में कोई और समझदार महिला है तो बात कराइए।"डॉक्टर कपूर उसके भारतीय होने और आरूषि के उसी हॉस्पिटल की फेमस सर्जन होने से जुड़ गई थी।

      अनुपम ने उनकी बात अपनी मां से करवा दी। उन्होंने तुरंत ही वहां आने और तब तक उनसे दोनों को संभालने का वादा ले लिया और कमाल था कि डॉक्टर कपूर मान भी गई। अनुपम किसी तरह आरूषि को मनाकर स्मिता के साथ घर ले आया। उधर उदयपुर में खुशियां छा गई थी जब उन सबको समाचार मिला।
     मम्मीजी ने सौम्या, रुखसाना और सैयद साहब को भी खबर कर दी थी। सब खुश थे। मम्मीजी और बड़ी दादीजी तो बेहद खुश थी। मम्मीजी एक बार ही मां बन पाई थी और स्मिता का मां बनने का समाचार दादीजी के लिए तो आश्चर्य ही था।
        सैयद साहब ने अख्तर को, जो वहां लॉस एंजेलिस में अपनी होटल चैन के विस्तार के लिए आया हुआ था , अनुपम के पास जाने को कहा। बड़ी दादीजी ने मम्मीजी को वहां जाने का हुक्म दिया था। उन्होंने अर्पण को भी यूएस ले जाने की बात तय कर दी। वहीं रुखसाना ने भी साथ जाने की तैयारी कर ली। आख़िर उसे अपने भाई और बहिन से मिलने को मिल रहा था।

       स्मिता,आरूषि घर आ गई थी। पर आरूषि फिर से खाने से मना कर रही थी। अनुपम जिद करके उसे खिलाने लगा तो आरुषि को वोमिट हो गई। उसे देखकर स्मिता का भी जी मिचलाने लगा और वह भी वोमिट कर आई। दोनों को अनुपम ने साथ ही सुला दिया। मुश्किल से 7 दिन बीते अनुपम के। दोनों ने परेशान कर दिया था उसे और अख्तर को !!!

      अलग अलग फरमाइशें और जैसे तैसे पूरी होती तो वह चाहिए ही नहीं होता दोनों को। उसकी हालत देखकर डॉक्टर कपूर को बेहद हंसी आती।

   पर आरूषि !!! पढ़ाई और किसी पेशेंट को संभालना हो या कोई ऑपरेशन, सबमें मगन होकर अपनी हालत भुला बैठती थी। रुखसाना मम्मीजी के साथ अनुपम के घर पहुंच गई थी। अनुपम को जैसे चैन मिल गया था। अब दोनों ने उन दोनों को तंग करना शुरू जो कर दिया था।पर वह हैरान था कि मां और रुखसाना तंग होने की बजाय एंजॉय कर रही थी। 
             डॉक्टर कपूर ने उन दोनों की अल्ट्रा साउंड करवाई और अगला धमाका कर दिया। आरूषि के अबकी बार ट्विंस थे। वहीं स्मिता प्रेगनेंसी में सीनियर थी उसकी। स्मिता का प्यार अर्पण के लिए और गहरा हो गया था। वह इस खुशी का कारण उसे ही मानती थी। आरूषि के साथ उल्टा था। वह तीसरी बार, वह भी ट्विंस को लेकर परेशान थी। आख़िर एक दिन उसने अनुपम को अकेला पाकर अपनी खीज निकाल दी।

     "बस यही रह गया है। जब भी साथ रहो, प्रेगनेंट हो जाओ।"

     "अरे !! मेरी क्या गलती है ?? "

          "नहीं सब गलती मेरी ही है। आख़िर पत्नियां ही तो ज़िम्मेदार है सबके लिए। आप लोगों की तो कोई जिम्मेदारी होती ही नहीं ??"

    "तो, मैंने कहा था कि हर बार दूर चली जाओ। फिर साथ मिले तो बस दूरियां बनाकर रहो।"

     "नहीं करनी बात आपसे" वह रूठ गई थी।

     परिजनों को जहां बेहद खुशी थी वहीं अनुपम दोनों के बार बार बदलते स्वभाव और मांगों से परेशान था। कभी कभी यह उसके व्यवहार में झलकता भी था। रुखसाना समझ गई थी।

    "भाई आप परेशान न होकर खुशी मनाइए।"

    "अब इसमें खुशी कैसे ढूंढू ?"

         "राधा का यह व्यवहार सामान्य है और आपको पता नहीं अर्पण के समय वह गुम रहती थी इतना कि अर्पण और उसकी जान पर बन आई थी। हम सभी बेहद परेशान हो गए थे। बाद में वह आपके प्रति अपराध बोध से परेशान थी। क्योंकि दोनों बच्चों के समय आप नहीं थे। यह तो ऊपरवाले की मेहरबानी है कि आज वह अपनी पीड़ा से बाहर है। वरना...."

       "दी, आप बिल्कुल सही हैं।" अनुपम समझ गया था और वो दोनों का ज्यादा ध्यान रखने लगा था।

         कुछ समय बाद डॉक्टर कपूर ने स्मिता को यात्रा की अनुमति दे दी थी तो मम्मीजी उसे लेकर भारत लौट आई थी। अब रुखसाना आरूषि को अपने घर ले आई थी जो सैयद साहब ने राधा की सुविधा के लिए खरीद दिया था। आरूषि को यहां ज्यादा आराम था। वह अपने भाई बहिन के साथ थी आख़िर !! 

        समय बीत रहा था। रुखसाना को भी भारत लौटना पड़ा। अब अनुपम ही आरूषि के पास था उधर डॉक्टर कपूर और हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने भी आरूषि की जिम्मेदारी ले ली थी। रुखसाना के लौटने पर मम्मीजी को 15 दिन बाद का वीजा मिल गया था।

********

          "डॉक्टर आरूषि से बात कराइए प्लीज़। इट्स एन इमरजेंसी !!"  रात 12 बजे डॉक्टर कपूर का घबराया और रूआंसा स्वर फ़ोन पर था।

     "डॉक, क्या बात है ? अपनी परेशानी तो बताएं।" अनुपम भी चिंतित हो उठा था।

     "मेरे बेटे और उसके  भाई के कार एक्सीडेंट में सर में गंभीर चोटें आई हैं। अब वे ही......."   वे फ़ोन पर ही रोने लगीं।

       "आप चिंता न करें। हम आ रहे हैं। आप रिपोर्ट्स हमें भेज दें।" आरूषि ने अनुपम से फ़ोन ले लिया था। उसने अपनी टीम को भी एक्टिव कर दिया था। 

      अनुपम आरूषि को लेकर पहुंच गया था। रात 1 बजे ऑपरेशन शुरू हुआ। आरूषि जी जान से लग गई थी। सुबह 6 बजे तक दोनों जानें बचा ली थी उसने। पर लगातार खड़े रहने से उसे प्रीमेच्योर डिलीवरी पेन स्टार्ट हो गए थे। अब डॉक्टर कपूर की बारी थी। अनुपम बेहद घबराया और परेशान था। आख़िर आरूषि के लिए उत्पन्न खतरे से वह अंजान नहीं था।

        "थैंक्स एंड कांग्रेचुलेशन मिस्टर अनुपम। आरूषि ने आपको और मुझे डबल प्रेजेंट्स दिए हैं।"वे अनुपम से मिलकर बोली,"यू हैव ए गर्ल एंड ए बॉय। इन्फेंट्स एंड मदर आर सेफ।"

    "थैंक्स डॉक्टर, क्या मैं उन्हें मिल सकता हूं ?"

        "उनको रूम में शिफ्ट किया जा रहा है। मैं इनफॉर्म करवाती हूं आपको।"

       थोड़ी देर बाद अनुपम की गोद में उसके बच्चे दे दिए गए। अनुपम खुशी से बोल नहीं पा रहा था। उसने पहली बार अपने बच्चों को जन्म लेते ही गोद में लिया था। आरूषि उसकी खुशी पढ़ पा रही थी। उधर भारत में फ़ोन पहुंचते ही सौम्या और मम्मीजी इमरजेंसी वीज़ा पर यूएस रवाना हो गई।। दोनों वहां पहुंचते ही सीधे आरूषि के पास आ गई। जहां मम्मीजी की खुशी छलक रही थी वहीं सौम्या थोड़ी शर्मिंदा थी। मम्मीजी ने आरूषि को गले लगाकर चूम लिया था और आरूषि भी अपनी मां का साथ पाकर बेहद खुश थी। दूसरे दिन स्मिता के भी मां बनने की ख़बर आ गई थी तो उदयपुर में सब बेहद खुश थे। दादीजी का आशीर्वाद फ़ोन पर आरूषि को मिल गया था।

          "डॉक्टर, आपसे उन दोनों घायलों के पैरेंट्स मिलना चाहते हैं  जिनकी जान आपने बचाई थी।"नर्स भी भारतीय मूल की थी।

         आरूषि ने अनुमति दे दी। उनके अंदर आते ही आरूषि और मम्मीजी दोनों चौंक पड़ी। उनका भी यही हाल था।

     "मिस्टर चौहान,आपको यहां आना नहीं चाहिए था। कहीं आपके परिवार में कोई अपशकुन नहीं हो जाए।"मम्मीजी का स्वर कटु हो चला था। वे दोनो आरूषि के चाचा ही थे वहीं बड़ी चाची भी साथ थी। डॉक्टर कपूर उसकी छोटी चाची थी। उन्हें कुछ पता नहीं था। आरूषि भी कपूर उपनाम से उन्हें नहीं समझ पाई थी। वह अपनी मां से चिपक गई थी। वह डर वापस लौट रहा था।

      "जीजी सा, हमें शायद माफ़ी नहीं मिल सकती पर आरूषि ने अपने भाइयों की जान बचाई है।"

        "जीजी कहने का और आरूषि पर आप लोग अपना हक़ खो चुके हैं। मेरी बेटी है ये, आप लोगों की कोई नहीं।" मम्मीजी ने आरूषि को अपने में समेट लिया था। सौम्या स्तब्ध खड़ी थी।

    तीनों अपराधी बेतरह रो रहे थे। पर डॉक्टर कपूर को जब सच पता चला तो उन्होंने बाकी सभी को बाहर जाने के लिए कह दिया।

      "दी, आप बड़ी हैं। आप जो चाहे सजा दे दें पर सिर्फ एक बार मुझे अपनी भतीजी को गले लगाने दे।" वे मम्मीजी के सामने हाथ जोड़े थी।

       "आपकी कोई गलती नहीं तो आपको माफ़ी की जरूरत नहीं। मुझे बेटियों को अपशकुनी मानने की प्रथा और ऐसे लोगों से नफ़रत है बस।"

     "दी आपको विश्वास दिलाती हूं कि इस परिवार में अब कभी भी ऐसा कोई नहीं करेगा। मेरे पास बेटी नहींं, बड़ी मुश्किल से इसे पाया है। हमारी किस्मत देखिए दोहिताें का जन्म मेरे इन हाथों में ही हुआ और मुझे पता ही नहीं।"उनका गला रूंध गया था और रो पड़ी थी वे।

     "आपका परिवार आरूषि का मुजरिम है, मेरा नहीं। फिर भाई बहिन के प्यार के बीच में मैं नहीं आऊंगी पर भाभी अपने भाइयों और बड़ी भाभी को शायद अभी माफ़ न कर पाऊंगी। मुझे आरू अपनी संतान से भी ज्यादा प्यारी है।" मम्मीजी की इस बात ने आरूषि को भी रुला दिया था। वह उनसे लिपट गई।
    डॉक्टर कपूर के हाथ पकड़ लिए आरूषि ने, जब वे रोते हुए वापस जानें लगी। मां की और देखकर इजाज़त मांगी और उनके हाथों में अपने बच्चों को दे दिया।उनकी प्रतिक्रिया देखने लायक थी। नानी बनने की खुशी उनके चेहरे पर दिख रही थी।
     उन्होंने जब बताया कि वे भी केवल एक बच्चे को ही जन्म दे पाई थी तो उनका और मम्मीजी का दुःख एक सा हो आया। मम्मीजी ने उन्हें भी अपने गले से लगा लिया।

आरूषि घर लौट आई थी। डॉक्टर कपूर ने भी अपना वादा निभाया था। उनके पति और बाकी सारे परिवार के चेहरों पर अपने गुनाह की माफ़ी की सच्ची चाहत दिख रही थी।
      मम्मीजी की माफ़ी और आरूषि के मन की ग्रंथि खतम होने की डॉक्टर की रिपोर्ट ने आरूषि के परिवार को भी उससे मिला दिया था।
आखिर आरूषि की पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च पूरी हुई। अब वह हर प्रकार की न्यूरो सर्जरी में निपुण थी। उसके भारत लौटने का समय आ गया था। आरूषि के भाईयों ने अपने प्यार से आरूषि को परिवार सहित उनके घर आने पर मजबूर कर दिया।

     "दी, हम दिल से अपने पेरेंट्स की गलतियों की माफ़ी मांगते हैं। अपने भतीजों और भतीजी के लिए यह छोटा सा तोहफ़ा है। प्लीज़ मना मत कीजिएगा।"उन्होंने प्रतापगढ़ की सारी संपत्ति उनके नाम कर दी थी। पर आरूषि ने लेने से इंकार कर दिया।

        "बेटी, मेरी गलतियों के लिए माफ़ कर सकोगी !!" आरूषि की बड़ी चाचीजी ने उसके पैर छूने की कोशिश की तो उसने उन्हें रोक दिया। उसके दोनों चाचाओं ने भी मूक माफ़ी मांगती नजरों से उसकी ओर देखा। उसने एक नज़र अपने परिवार को देखा और उनकी इजाज़त देखकर उनके गले लग गई। उन लोगों ने मम्मीजी से भी माफ़ी मांग ली थी और कभी भी लड़कियों को अपशकुनी न मानने की कसम खा ली थी।

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               अब आरूषि बिल्कुल शान्त हो गई थी। वह भारत लौट आई। उधर मम्मीजी की भी मन की हो गई थी। उनके अपने बच्चों के न होने की कमी आरूषि ने पूरी जो कर दी थी। वे उनमें मगन थी। उदयपुर और प्रतापगढ़ के परिवारों की आंखो का नूर भी बन गई थी आरूषि। सब उसे बेहद लकी मान चुके थे। आरूषि अपने हॉस्पिटल और मम्मीजी के बिज़नेस को संभाल रही थी। अनुपम ने भी वीआरएस के लिए अप्लाई कर दिया था ताकि आरूषि अपने हुनर को लोगों की भलाई के लिए ज्यादा से ज्यादा काम ले सके।


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         महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के कोंकण तट पर स्थित गांव के मकान में 2 बच्चों के लड़ने के शोर की आवाजें और उनको अलग करती 2 और आवाजें गूंज रही थी।

     " अनु तेरा मुंह तोड़ दूंगी, मेरे टेडी को खराब क्यों किया ?"

   "जा जा तेरा नहीं वो मेरा टेडी है। आरव भैया मेरे लिए लाए थे। तुझे अब बिल्कुल नहीं मिलेगा, अल्का की बच्ची।" दोनों फिर से एक दूसरे से उलझ गए थे।

    "अर्पण, आप अल्का को ले जाइए। मैं अनुभव को संभालता हूं।"

     "आरव भैया, इन्हें केवल मम्मी ही संभाल सकती हैं और अभी वह मुंबई में है।"  अर्पण अल्का को काबू करने की कोशिश कर रहा था।

    "अरे दोनों शैतानों !! लड़ो मत मैं दो नए टेडी ले आई हूं।" तभी घर में उनकी मौसी आई।

    "मौसीजी मेरे हैं दोनों।"

  "जा जा मुंह धो ले मौसी तो मेरे लिए लाई है।"

     "अच्छा तो बुआ से किसी को प्यार नहीं।" उनकी बुआ भी आ गई थी। दोनों उनसे भी जा लिपटे।

     "और मैं भी खेलूंगा"उनकी बुआ के बेटे की आवाज़ आई।

      "अरे सौम्या, रुखसाना आप दोनों कब आई ?"

    "बस घर में घुसे ही हैं अनु भाई।" रूखसाना आवाज़ की ओर मुड़ी। आने वाला अनुपम ही था।

     "अब आप अपने परिवार को इतनी दूर ले बसे हैं तो आने मैं भी वक्त लगता है भाई।" सौम्या उसके गले लग गई थी।  "भाभी कब आ रही हैं ?" 

   "अब वह केवल दूसरे सर्जन्स को ट्रेन करती है। आती ही होगी।"

   " न्यूरो सर्जरी का सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल बना दिया है उस हॉस्पिटल को उन्होंने।" सौम्या की आवाज में गर्व था।

    "राधा आ गई, रुख दी"  आने वाली महिला अपनी बहिन के गले लग गई।

     जी हां, सही पहचाना आपने। यह ही थी आरूषि !! 

11 वर्ष बीत गए थे। मम्मीजी और दोनों के परिवार के कई बड़े ईश्वर के पास चले गए थे। अनुपम और आरूषि ने अपनी सारी संपत्ति एनजीओ बनाकर उसके नाम कर दी थी। उदयपुर, चंडीगढ़, लखनऊ, गुवाहाटी, प्रतापगढ़, जयपुर, दिल्ली और मुम्बई की संपत्तियों में लोगों की सहायता और जरूरत के अनुसार कई संस्थान चल रहे थे। बंगलौर में भी अभी मूक बधिर विद्यालय खोला गया था। अनुपम ही सारी गतिविधियां संभालता था। वे कई और जगहों पर भी जल्दी ही हेल्प सेंटर्स चलाने वाले थे। बस कुल्लू के उस छोटे घर को ही अपने लिए रख छोड़ा था। हालांकि वे इस शांत जगह पर आम लोगों की तरह जीने चले आए थे। पर उनके परिवार के लोग उनसे मिलने और उनके काम में अपना योगदान देने आते रहते थे।

आज उनकी शादी की वर्षगांठ थी तो शाम तक उदयपुर, गुवाहाटी और लखनऊ से सारे लोग चले आए थे। सारी रात सबका शोर गूंजता रहा। फिर सुबह सब एक एक करके लौट गए। आरव भी मुम्बई आईआईटी चला गया था। वहीं अर्पण के मामा उसे यूएस ले गए थे। बस अनुभव और अल्का ही रह गए थे उनके पास।

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"क्या देख रही हो आरू ?" अनुपम की आवाज सुनकर दूर सागर में डूबते सूरज को निहारती आरूषि चौंक पड़ी।

"बस अपनी जिन्दगी से जुस्तजू को याद कर रही थी।" उसने अनुपम के कंधे पर अपना सिर टिका दिया।

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20 Comments

Arman Ansari

31-Jan-2022 08:02 PM

बहुत याद आएगी आपकी कहानी जल्द ही दूसरी कहानी आएगी आपकी उम्मीद है !

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Ajay

31-Jan-2022 11:40 PM

जरूर, तब तक मेरी अन्य लघुकथा पढ़कर समीक्षा दीजिएगा। जल्द मिलेंगे एक और लघुकथा के साथ।🙏🏻🙏🏻

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वैभव

28-Jan-2022 02:42 PM

काफी अच्छी कहानी लिखी है आपने, इस कहानी को पढ़ लगता है यहां भी अच्छी कहानियां है पढ़ने के लिए। मजा आ गया पढ़कर.💐💐💐

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Ajay

28-Jan-2022 02:50 PM

मेरे प्रोफ़ाइल पर और भी लघुकथाएं और एक कहानी है उसे भी पढ़कर अपनी अमूल्य राय दें।

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Arshi khan

27-Jan-2022 12:19 AM

काफ़ी उम्दा, शानदार कहानी लिखी थी आपने। जज़्बात से भरी हुई. पढ़ते हुए काफी मजा आया। ये जर्नी आरुषि और अनुपम हमेशा याद रहेंगे। शुक्रिया ऐसी खूबसूरत कहानी के लिए

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Ajay

27-Jan-2022 06:43 PM

शुक्रिया आपका। बस ऐसे ही कमेंट कर उत्साह बढ़ाती रहें।🙏🏻

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